हनुमान तांडव स्तोत्र: 10 अद्भुत श्लोक और चमत्कारी लाभ
हनुमान तांडव स्तोत्र भगवान हनुमान जी की वीरता, भक्ति और शक्ति का अद्भुत वर्णन करने वाला एक दुर्लभ संस्कृत स्तोत्र है। इसमें हनुमान जी को पवनपुत्र, रामदूत और संकटमोचन के रूप में वर्णित किया गया है।
इस स्तोत्र के अंतिम श्लोक के अनुसार इसकी रचना लोकेश्वर भट्ट द्वारा की गई थी। यह स्तोत्र हनुमान जी की सेवा भावना, लक्ष्मण जी के प्रति स्नेह और रावण वध में उनकी भूमिका का सुंदर चित्रण करता है।
इस लेख में हम आपको हनुमान तांडव स्तोत्र का संपूर्ण पाठ, सरल अर्थ, पाठ विधि और लाभ विस्तार से बताएंगे।
इस लेख में क्या पढ़ेंगे (Table of Contents)
- ध्यान श्लोक
- संपूर्ण हनुमान तांडव स्तोत्र पाठ
- स्तोत्र का सरल अर्थ
- स्तोत्र का महत्व
- पाठ करने की सही विधि
- स्तोत्र के लाभ
- निष्कर्ष
ध्यान श्लोक
स्तोत्र पाठ से पहले हनुमान जी का ध्यान इस प्रकार किया जाता है:
वन्दे सिन्दूरवर्णभं लोहिताम्बरभूषितम्।
रक्ताङ्ग्राघशोभाध्यं शोणपुच्छं कपीश्वरम्॥
इस ध्यान श्लोक में हनुमान जी को सिंदूर वर्ण, लाल वस्त्र धारण किए, लाल अंगों से सुशोभित और लाल पूंछ वाले कपीश्वर के रूप में वंदन किया गया है।
संपूर्ण हनुमान तांडव स्तोत्र पाठ
नीचे हनुमान तांडव स्तोत्र का संपूर्ण मूल पाठ दिया गया है।
भजे समीरनन्दनं, सुभक्तचित्तरंजनं, दिनेशरूपभक्तं, सर्वभक्तरक्षकम्।
सुकंठकार्यसाधकं, रोजगारसाधकं, समुद्रपरागामिनं, नमामि सिद्धकामिनम्॥1॥
सुशक्कितं सुकंठभुक्त्वान् हि यो हितं वाचस्त्वमाशु गाधिर्यमाश्रयात्र वो भयं कदापि न।
इति प्लवङ्गनाथभाषितं निश्म्य वन- राधानाथ आप शं तदा, स रामदूत आश्रयः॥2॥
सुदीर्घबाहुलोचनेन, पुच्छगुच्छशोभिना, भुजद्वेन सोडारिं निज़ांस युग्ममास्थितौ।
कृतौ हि कोसलधिपौ, कपीशराजसन्निधौ, विधेजेशलक्ष्मणौ, स मे शिवं करोतवरम्॥3॥
सुशब्दशास्त्रपारगं, विलोक्य रामचन्द्रमाः, कपीश नाथसेवकं, सर्वनीतिमार्गगम।
प्रशस्य लक्ष्मणं प्रति, प्रलंबबाहुभूषितः कपिन्द्रसाख्यमाकरोत, स्वकार्यसाधकः प्रभुः॥4॥
प्रचण्डवेगधारिणं, नगेन्द्रगर्वहारिणं, फणीषामातृगर्वहृद्ददृशास्यवासनाकृत:।
विभीषणेन साख्यकृद्विदेह जातितापहृत्, सुकंठकार्यसाधकं, नमामि यातुधातकम्॥5॥
नमामि पुष्पमौलीनं, सुवर्णवर्णधारिणं गदायुधेन भूषितं, किरीटकुण्डलन्वितम्।
सुपुच्छगुच्छतुच्छलंकदाहकं सुनैकं टीकापक्षराक्षसेन्द्र-सर्ववंशनाशम्॥6॥
रघुत्तमस्य सेवकं नमामि लक्ष्मणप्रियं दिनेशांशभूषणस्य मुद्रिकाप्रदर्शकम्।
विदेहजातिशोक्तपहारिणम् आघातिणम् सुसुक्ष्मरूपधारिणं नमामि दीर्घरूपिणम्॥7॥
नभस्वदात्मजेण भास्वता त्वया कृता महसह यता यया द्वयोर्हितं ह्यभूतस्वकृततः।
सुकंठ आप तारकं रघुत्तमो विदेहजां निपात्य वालिनं प्रभुस्ततो दशाननं खलम्॥8॥
इमं स्तवं कुजेऽह्नि यः पथेत्सुचेत्सा नरः कपीशनाथसेवावो भुन्तिसर्वसम्पदाः।
प्लवङ्गराजसत्कृपाकताक्षभजनस्सदा न शत्रुतो भयं भवेत्कदापि तस्य नुस्तविह॥9॥
नेत्राङ्गन्नंदधरणिवत्सरेऽन्नङ्गवसरे। लोकेश्वराख्यभट्टेन हनुमताण्डवं कृतम्॥10॥
॥ इति श्रीहनुमत्ताण्डवस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥
स्तोत्र का सरल अर्थ
इस स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक में हनुमान जी के अलग-अलग गुणों और लीलाओं का वर्णन है।
पहले श्लोक में हनुमान जी को पवनपुत्र, भक्तों का हित करने वाला और समुद्र पार करने वाला सिद्धकामी बताया गया है। दूसरे श्लोक में उनके वचन को सुनकर वानरराज सुग्रीव को भय-मुक्त होने का भाव वर्णित है।
तीसरे और चौथे श्लोक में राम-लक्ष्मण को कंधे पर बिठाकर ले जाने और लक्ष्मण जी के साथ उनकी मित्रता का उल्लेख है। पांचवें श्लोक में विभीषण से मित्रता और सीता माता के शोक को दूर करने का वर्णन है।
छठे श्लोक में लंका दहन और रावण वंश के नाश का वर्णन है, जबकि सातवें श्लोक में श्रीराम की मुद्रिका सीता माता को दिखाने का प्रसंग है। आठवें श्लोक में बालि वध और रावण वध का उल्लेख मिलता है।
नौवें श्लोक में इस स्तोत्र का पाठ करने वालों को शत्रु भय से मुक्ति और संपत्ति प्राप्ति का फल बताया गया है। अंतिम श्लोक में स्तोत्र के रचयिता लोकेश्वर भट्ट का उल्लेख है।
स्तोत्र का महत्व
हनुमान तांडव स्तोत्र हनुमान जी की वीरता और भक्ति दोनों रूपों को एक साथ प्रस्तुत करता है। यह स्तोत्र रामायण की घटनाओं — सुग्रीव मित्रता, लंका दहन, सीता खोज, बालि वध और रावण वध — को संक्षेप में समेटे हुए है।
इसे पढ़ने से भक्त हनुमान जी की संपूर्ण लीला का स्मरण एक साथ कर पाते हैं। यही कारण है कि इसे हनुमान अष्टक जैसे अन्य स्तोत्रों के साथ विशेष अवसरों पर पढ़ा जाता है।
पाठ करने की सही विधि
हनुमान तांडव स्तोत्र का पाठ करने के लिए यह विधि अपनाई जाती है:
- मंगलवार के दिन इस स्तोत्र का पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है।
- स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- हनुमान जी के सामने दीपक और अगरबत्ती जलाएं।
- पहले ध्यान श्लोक का उच्चारण करें, फिर संपूर्ण स्तोत्र पढ़ें।
- श्रद्धा भाव से नियमित पाठ करें और अंत में आरती करें।
स्तोत्र के लाभ
स्तोत्र के नौवें श्लोक में स्वयं इसके लाभ बताए गए हैं। नियमित पाठ से भक्तों को निम्न लाभ मिलने की मान्यता है:
- शत्रु भय से मुक्ति: शत्रुओं से उत्पन्न भय और बाधाएं दूर होती हैं।
- धन-संपदा प्राप्ति: जीवन में सुख-समृद्धि और संपत्ति के योग बनते हैं।
- हनुमान जी की कृपा दृष्टि: भक्त पर वानरराज की विशेष कृपा बनी रहती है।
- मानसिक शक्ति: आत्मबल और साहस में वृद्धि होती है।
- कार्य सिद्धि: रुके हुए कार्यों में सफलता मिलती है।
निष्कर्ष
हनुमान तांडव स्तोत्र भक्ति और वीरता का अनूठा संगम है। यह स्तोत्र हनुमान जी की संपूर्ण लीलाओं का स्मरण कराता है और भक्तों को शत्रु भय से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है।
जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस स्तोत्र का नियमित पाठ करते हैं, वे हनुमान जी की विशेष कृपा और सुरक्षा का अनुभव करते हैं।
जय हनुमान, जय संकटमोचन!