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वीरविंशतिका स्तोत्र: हनुमान जी के 21 अद्भुत श्लोक और लाभ

 

वीरविंशतिका स्तोत्र: हनुमान जी के 21 अद्भुत श्लोक और लाभ

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वीरविंशतिका स्तोत्र हनुमान जी की वीरता, पराक्रम और भक्ति का अद्भुत वर्णन करने वाला 21 श्लोकों का संस्कृत स्तोत्र है। इसकी रचना कविपति उपनाम वाले उमापति शर्मा द्विवेदी ने की थी, जैसा कि स्तोत्र के अंतिम श्लोक में स्वयं उल्लेख मिलता है।

यह स्तोत्र समुद्र लांघने, सीता माता की खोज, लंका दहन, अक्षय कुमार वध और चूड़ामणि लेकर लौटने जैसी हनुमान जी की प्रमुख लीलाओं का संक्षिप्त लेकिन प्रभावशाली चित्रण करता है।

इस लेख में हम आपको वीरविंशतिका स्तोत्र का संपूर्ण पाठ, सरल भावार्थ, पाठ विधि और लाभ विस्तार से बताएंगे।

इस लेख में क्या पढ़ेंगे (Table of Contents)

संपूर्ण वीरविंशतिका स्तोत्र पाठ

नीचे वीरविंशतिका स्तोत्र का संपूर्ण मूल संस्कृत पाठ दिया गया है।

 

लाङ्गूलमृष्टवियदम्बुधिमध्यमार्ग मुत्प्लुत्ययान्तममरेन्द्रमुदो निदानम्।

आस्फालितस्वकभुजस्फुटिताद्रिकाण्डं द्राङ्मैथिलीनयननन्दनमद्य वन्दे॥1॥

 

मध्येनिशाचरमहाभयदुर्विषह्यं घोराद्भुतव्रतमियं यददश्चचार।

पत्ये तदस्य बहुधापरिणामदूतं सीतापुरस्कृततनुं हनुमन्तमीडे॥2॥

 

यः पादपङ्कजयुगं रघुनाथपत्न्या नैराश्यरूषितविरक्तमपि स्वरागैः।

प्रागेव रागि विदधे बहु वन्दमानो वन्देञ्जनाजनुषमेष विशेषतुष्ट्यै॥3॥

 

ताञ्जानकीविरहवेदनहेतुभूतान् द्रागाकलय्य सदशोकवनीयवृक्षान्।

लङ्कालकानिव घनानुदपाटयद्यस्तं हेमसुन्दरकपिं प्रणमामि पुष्ट्यै॥4॥

 

घोषप्रतिध्वनितशैलगुहासहस्र सम्भान्तनादितवलन्मृगनाथयूथम्।

अक्षक्षयक्षणविलक्षितराक्षसेन्द्रमिन्द्रं कपीन्द्रपृतनावलयस्य वन्दे॥5॥

 

हेलाविलङ्घितमहार्णवमप्यमन्दं धूर्णद्गदाविहतिविक्षतराक्षसेषु।

स्वम्मोदवारिधिमपारमिवेक्षमाणं वन्देऽहमक्षयकुमारकमारकेशम्॥6॥

 

जम्भारिजित्पसभलम्भितपाशबन्धं ब्रह्मानुरोधमिव तत्क्षणमुद्वहन्तम्।

रौद्रावतारमपि रावणदीर्घदृष्टि सङ्कोचकारणमुदारहरिं भजामि॥7॥

 

दर्पोन्नमन्निशिचरेश्वरमूर्धचञ्चत्कोटीरचुम्बि निजबिम्बमुदीक्ष्य हृष्टम्।

पश्यन्तमात्मभुजयन्त्रणपिष्यमाण तत्कायशोणितनिपातमपेक्षि वक्षः॥8॥

 

अक्षप्रभृत्यमरविक्रमवीरनाशक्रोधादिव द्रुतमुदञ्चितचन्द्रहासाम्।

निद्रापिताभ्रघनगर्जनघोरघोषैः संस्तम्भयन्तमभिनौमि दशास्यमूर्तिम्॥9॥

 

आशंस्यमानविजयं रघुनाथधाम शंसन्तमात्मकृतभूरिपराक्रमेण।

दौत्ये समागमसमन्वयमादिशन्तं वन्दे हरेः क्षितिभृतः पृतनाप्रधानम्॥10॥

 

यस्यौचितीं समुपदिष्टवतोऽधिपुच्छ दम्भान्धितां धियमपेक्ष्य विवर्धमानः।

नक्तञ्चराधिपतिरोषहिरण्यरेता लङ्कां दिधक्षुरपतत्तमहं वृणोमि॥11॥

 

क्रन्दन्निशाचरकुलां ज्वलनावलीढैः साक्षाद्गृहैरिवबहिः परिदेवमानाम्।

स्तब्धस्वपुच्छतटलग्नकृपीटयोनि दन्दह्यमाननगरीं परिगाहमानाम्॥12॥

 

मूर्तैर्गृहासुभिरिव द्युपुरं व्रजद्भिर्व्योम्नि क्षणं परिगतं पतगैर्ज्वलद्भिः।

पीताम्बरं दधतमुच्र्छितदीप्ति पुच्छं सेनां वहद्विहगराजमिवाहमीडे॥13॥

 

स्तम्भीभवत्स्वगुरुबालधिलग्नवह्नि ज्वालोल्ललद्ध्वजपटामिव देवतुष्ट्यै।

वन्दे यथोपरि पुरो दिवि दर्शयन्तमद्यैव रामविजयाजिकवैजयन्तीम्॥14॥

 

रक्षश्चयैकचितकक्षकपूश्चितौ यः सीताशुचो निजविलोकनतो मृतायाः।

दाहं व्यधादिव तदन्त्यविधेयभूतं लाङ्गूलदत्तदहनेन मुदे स नोऽस्तु॥15॥

 

आशुद्धये रघुपतिप्रणयैकसाक्ष्ये वैदेहराजदुहितुः सरिदीश्वराय।

न्यासं ददानमिव पावकमापतन्तमब्धौ प्रभञ्जनतनूजनुषं भजामि॥16॥

 

रक्षस्स्वतृप्तिरुडशान्तिविशेषशोण मक्षक्षयक्षणविधानमितात्मदाक्ष्यम्।

भास्वत्प्रभातरविभानुभरावभासं लङ्काभयंकरममुं भगवन्तमीडे॥17॥

 

तीर्त्वोदधि जनकजार्पितमाप्य चूडारत्नं रिपोरपि पुरं परमस्य दग्ध्वा।

श्रीरामहर्षगलदश्वभिषिच्यमानं तं ब्रह्मचारिवरवानरमाश्रयेऽहम्॥18॥

 

यः प्राणवायुजनितो गिरिशस्य शान्तः शिष्योऽपि गौतमगुरुर्मुनिशङ्करात्मा।

हृद्यो हरस्य हरिवद्धरितां गतोऽपि धीधैर्यशास्त्रविभवेऽतुलमाश्रये तम्॥19॥

 

स्कन्धेऽधिवाह्य जगदुत्तरगीतिरीत्या यः पार्वतीश्वरमतोषयदाशुतोषम्।

तस्मादवाप च वरानपरानवाप्यान् तं वानरं परमवैष्णवमीशमीडे॥20॥

 

उमापतेः कविपतेः स्तुतिर्बाल्यविजृम्भिता। हनूमतस्तुष्टयेऽस्तु वीरविंशतिकाभिधा॥21॥

 

॥ इति श्री कविपत्युपनामकोमापति शर्मद्विवेदिविरचितं वीरविंशतिकाख्यं श्रीहनुमत्स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

स्तोत्र का सरल भावार्थ

यह स्तोत्र संस्कृत की दृष्टि से अत्यंत उच्च कोटि का है, इसलिए इसका शब्दशः अनुवाद कठिन है। परंतु इसमें वर्णित प्रमुख प्रसंगों को हम सरल भाषा में समझ सकते हैं।

आरंभिक श्लोकों में हनुमान जी द्वारा अपनी पूंछ से समुद्र को स्पर्श करते हुए विशाल छलांग लगाकर लंका जाने का वर्णन है। इसके बाद सीता माता की खोज, अशोक वाटिका में उनकी वेदना को समझने और उन्हें आश्वासन देने का प्रसंग आता है।

मध्य के श्लोकों में अक्षय कुमार वध, हनुमान जी को इंद्रजीत के ब्रह्मास्त्र से बांधे जाने और रावण की सभा में प्रस्तुत किए जाने की घटना का वर्णन है। इसके पश्चात अपनी जलती पूंछ से संपूर्ण लंका को भस्म करने का प्रसिद्ध प्रसंग वर्णित है।

अंतिम श्लोकों में हनुमान जी के चूड़ामणि लेकर श्रीराम के पास लौटने, उनके वायुपुत्र होने, शिव जी के अवतार होने और पार्वती जी को प्रसन्न करने का उल्लेख है। अंतिम श्लोक में स्तोत्र रचयिता का परिचय दिया गया है।

स्तोत्र का महत्व

वीरविंशतिका स्तोत्र हनुमान जी की उन लीलाओं का वर्णन करता है, जो वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड में विस्तार से वर्णित हैं। यह स्तोत्र विशेष रूप से हनुमान जी के पराक्रम, साहस और भक्ति दोनों पक्षों को एक साथ प्रस्तुत करता है।

चूंकि यह हनुमान तांडव स्तोत्र जैसे अन्य दुर्लभ स्तोत्रों की तरह विद्वानों द्वारा रचित है, इसलिए इसकी भाषा गूढ़ और साहित्यिक दृष्टि से समृद्ध मानी जाती है। विद्वान और साधक विशेष रूप से इसका पाठ करते हैं।

पाठ करने की सही विधि

वीरविंशतिका स्तोत्र का पाठ करने के लिए यह विधि अपनाई जाती है:

  1. मंगलवार या शनिवार का दिन इस स्तोत्र के पाठ के लिए उत्तम माना जाता है।
  2. स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  3. हनुमान जी के सामने दीपक जलाकर आसन ग्रहण करें।
  4. शुद्ध उच्चारण के साथ श्रद्धा भाव से संपूर्ण स्तोत्र का पाठ करें।
  5. पाठ के अंत में हनुमान जी की आरती करें।

स्तोत्र के लाभ

नियमित रूप से इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को निम्न लाभ मिलने की मान्यता है:

निष्कर्ष

वीरविंशतिका स्तोत्र हनुमान जी की वीरता और भक्ति का दुर्लभ किंतु प्रभावशाली वर्णन प्रस्तुत करता है। इसके 21 श्लोकों में समुद्र लांघने से लेकर लंका दहन तक की समस्त लीलाओं का सार समाहित है।

जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस स्तोत्र का नियमित पाठ करते हैं, उन्हें साहस, सुरक्षा और हनुमान जी की विशेष कृपा प्राप्त होने की मान्यता है।

जय हनुमान, जय संकटमोचन!

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